उत्तराखंड सरकार में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने पिछले पांच वर्षो में विज्ञापन और प्रचार पर जो राशि खर्च की है, वह हैरान करने वाली है। राज्य सरकार ने जनता के बीच अपनी छवि मजबूत करने और सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए कुल 1001.07 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। औसतन देखें तो हर दिन करीब 55 लाख रुपये प्रचार पर खर्च किए गए हैं।
पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल में प्रचार खर्च में तेज़ी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल में सरकारी प्रचार बजट में जबरदस्त उछाल देखा गया है।
जहां 2020-21 में त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार ने विज्ञापन पर 77.71 करोड़ रुपये खर्च किए थे, वहीं धामी के सत्ता संभालने के बाद यह राशि लगातार बढ़ती गई।
2021-22 में खर्च बढ़कर 227.35 करोड़ रुपये हो गया और मौजूदा वित्तीय वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 290.29 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।
त्योहारों और संदेशों पर लाखों रुपये का खर्च
सरकार की प्रचार रणनीति केवल विज्ञापनों तक सीमित नहीं रही।
उदाहरण के तौर पर, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केदारनाथ धाम का दौरा किया, तब राज्यभर के लोगों को इस यात्रा की जानकारी भेजने के लिए 49.73 लाख रुपये खर्च किए गए।
इसी तरह हरेला पर्व के दौरान शुभकामना संदेश भेजने पर दो बार में कुल 75 लाख रुपये का व्यय हुआ।
पहली बार 13 जुलाई 2024 को और फिर एक महीने बाद 13 अगस्त को वही संदेश दोबारा भेजा गया।
मल्टीप्लेक्स और सिनेमा हॉल में भी दिखाए गए सरकारी विज्ञापन
सरकार ने प्रचार को केवल पारंपरिक मीडिया तक सीमित नहीं रखा।
2023-24 में पीवीआर जैसे मल्टीप्लेक्स सिनेमा घरों में उत्तराखंड सरकार के विज्ञापन दिखाने पर 17.44 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
यह दर्शाता है कि सरकार ने युवाओं और शहरी दर्शकों तक पहुंच बनाने के लिए नए माध्यमों को भी अपनाया है।
टीवी मीडिया पर सबसे अधिक खर्च
पिछले पांच वर्षों में टेलीविजन विज्ञापनों पर सरकार ने सबसे अधिक 427 करोड़ रुपये खर्च किए हैं।
इसमें से 402 करोड़ रुपये केवल पिछले चार वर्षों में, यानी धामी के कार्यकाल में दिए गए हैं।
राष्ट्रीय समाचार चैनलों को 105.7 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ, जिसमें सबसे अधिक राशि न्यूज़ 18 इंडिया को दी गई।
रिलायंस समूह के नेटवर्क 18 को अकेले 2024-25 में 5.69 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं।
डिजिटल और अन्य माध्यमों पर भी बड़ा निवेश
धामी सरकार के कार्यकाल में मीडिया विविधीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया।
समाचार पत्रों को 129.6 करोड़ रुपये, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर 61.9 करोड़ रुपये, रेडियो प्रचार पर 30.9 करोड़ रुपये, फिल्म विज्ञापन पर 23.4 करोड़ रुपये, एसएमएस सेवाओं पर 40.4 करोड़ रुपये, आउटडोर विज्ञापनों पर 49.5 करोड़ रुपये, प्रकाशन सामग्री पर 56 करोड़ रुपये, और समाचार एजेंसियों को 128.7 करोड़ रुपये दिए गए।
इन सभी माध्यमों पर कुल मिलाकर 923 करोड़ रुपये से अधिक का व्यय हुआ है।
क्षेत्रीय मीडिया को मिला राष्ट्रीय चैनलों से ज़्यादा पैसा
रोचक बात यह है कि उत्तराखंड सरकार ने क्षेत्रीय चैनलों को राष्ट्रीय चैनलों की तुलना में कहीं अधिक भुगतान किया।
क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों को कुल 296.8 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ, जो राष्ट्रीय चैनलों को दी गई राशि से लगभग तीन गुना अधिक है।
साल 2021-22, जो विधानसभा चुनावों का वर्ष था, उसमें क्षेत्रीय चैनलों को विशेष रूप से 98.79 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।
देशभर में मीडिया नेटवर्क का विस्तार
सरकार की प्रचार नीति केवल उत्तराखंड या उत्तर भारत तक सीमित नहीं रही।
देश के अन्य राज्यों जैसे नागालैंड, ओडिशा, असम और पूर्वोत्तर क्षेत्र के मीडिया चैनलों को भी विज्ञापन दिए गए।
कुल 38 क्षेत्रीय चैनलों को इस सरकारी प्रचार से लाभ पहुंचा, जिनमें से 6 चैनलों को 4 करोड़ रुपये से अधिक और 9 चैनलों को 3 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया।
राष्ट्रीय मीडिया समूहों को भी मिला बड़ा हिस्सा
राष्ट्रीय स्तर पर भी कई प्रमुख मीडिया संस्थानों को भारी भुगतान किया गया।
2024-25 में टाइम्स नाउ को 4.79 करोड़ रुपये, जबकि टीवी टुडे नेटवर्क (आजतक ग्रुप) को 4.62 करोड़ रुपये प्राप्त हुए।
एनडीटीवी, जो हाल ही में अडाणी समूह के स्वामित्व में आया है, को इस सूची में पहली बार महत्वपूर्ण स्थान मिला और उसे 2.88 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया।
प्रचार नीति पर उठ रहे सवाल
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि उत्तराखंड सरकार ने अपनी छवि निर्माण और जनसंपर्क पर विशाल धनराशि खर्च की है।
हालांकि यह सरकारी दृष्टिकोण से “सूचना प्रसार” की नीति का हिस्सा बताया जा रहा है, लेकिन जनता के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इतनी बड़ी राशि जनता के विकास कार्यों की बजाय प्रचार पर खर्च करना उचित है
सरकारी प्रचार पर जनता की राय और पारदर्शिता का सवाल
उत्तराखंड सरकार के बढ़ते विज्ञापन खर्च ने जनता और विपक्ष दोनों के बीच बहस को जन्म दिया है। एक ओर सरकार का कहना है कि यह राशि राज्य की योजनाओं और विकास कार्यों की जानकारी जनता तक पहुंचाने के लिए आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि इतनी बड़ी रकम का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन में किया जाना चाहिए था।
प्रदेश के आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी राज्य की जनसंख्या सीमित हो और उसका वार्षिक बजट भी छोटा हो, तब एक हजार करोड़ रुपये जैसी राशि का प्रचार पर खर्च होना आर्थिक दृष्टि से असंतुलित प्रतीत होता है। यह न केवल सरकारी प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि राजनीति में “इमेज बिल्डिंग” अब नीति निर्माण से कहीं अधिक प्रभावशाली हो चुकी है।
कई नागरिक संगठनों ने सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से यह मांग भी की है कि ऐसे खर्चों की पारदर्शी समीक्षा होनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इन विज्ञापनों का वास्तविक लाभ जनता तक कितना पहुंचा। डिजिटल और सोशल मीडिया के इस युग में प्रचार के लिए इतनी भारी राशि खर्च करना, कई लोगों के अनुसार, सरकारी संसाधनों की बर्बादी भी हो सकती है।
इसके बावजूद, यह भी सच है कि आधुनिक शासन व्यवस्था में सूचना प्रसार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। सरकारें चाहें तो इस धनराशि का उपयोग अधिक संतुलित ढंग से कर सकती हैं — जैसे जनजागरूकता अभियानों, पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रमों या पर्यटन विकास योजनाओं में। इस तरह प्रचार के साथ-साथ जनहित भी सुनिश्चित किया जा सकता है।
न्यूज़ सोर्स: News Laundry Hindi
मूल बैकलिंक: https://hindi.newslaundry.com/2025/10/01/uttarakhand-information-department-spent-thousand-crore-for-publicity

टीवी मीडिया पर सबसे अधिक खर्च