News waqt

Trending latest News

  • Home
  • Health
    • Fitness
    • Lifestyle
  • Entertainment
    • Movie Review
  • Sports
    • Cricket
  • Politics
  • Tech
    • Mobile
  • Science
  • Education
  • Local News
    • Uttar Pradesh
  • Business
  • Global
Font ResizerAa

News waqt

Trending latest News

Font ResizerAa
  • Home
  • Health
  • Entertainment
  • Sports
  • Politics
  • Tech
  • Science
  • Education
  • Local News
  • Business
  • Global
Search
  • Home
  • Health
    • Fitness
    • Lifestyle
  • Entertainment
    • Movie Review
  • Sports
    • Cricket
  • Politics
  • Tech
    • Mobile
  • Science
  • Education
  • Local News
    • Uttar Pradesh
  • Business
  • Global
Follow US

Language :

News waqt > Politics > 100 Year Of RSS : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल विरासत और विवाद की गाथा
Politics

100 Year Of RSS : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल विरासत और विवाद की गाथा

Amit gupta
Last updated: 2025/10/03 at 11:41 AM
Amit gupta
Share
12 Min Read
SHARE

1 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी शताब्दी पूरी कर ली। यह संगठन भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य का सबसे प्रभावशाली और सबसे विवादित संगठन माना जाता है। अपने समर्थकों की नजर में यह भारतीय संस्कृति, अनुशासन और सेवा का प्रतीक है, तो आलोचकों की दृष्टि में यह संगठन सांप्रदायिकता और विभाजनकारी राजनीति का केंद्र है। इस लेख में हम इसकी यात्रा, विचारधारा, प्रमुख घटनाओं और समकालीन प्रभाव का व्यापक अध्ययन प्रस्तुत कर रहे हैं।

Contents
स्थापना की पृष्ठभूमिस्वतंत्रता संग्राम और संघगोलवलकर का नेतृत्व और विचारधारा का मोड़गांधी हत्या और संघ पर संकटसमाज में भूमिका और आलोचनाहिन्दुत्व और राजनीतिधीरेंद्र झा का विश्लेषण: फ्रिंज संगठन और नेटवर्कआधुनिक काल में विस्तारशताब्दी समारोह और विवादनिष्कर्षNews Source

स्थापना की पृष्ठभूमि

ब्रिटिश राज के दौरान भारतीय समाज में गहरे विभाजन मौजूद थे। हिंदू समाज आंतरिक संघर्षों और जातिगत विखंडन से जूझ रहा था। डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार, जो कांग्रेस से भी जुड़े रहे थे, ने इस चुनौती को समझा और 1925 में नागपुर में आरएसएस की स्थापना की। उनका मानना था कि यदि हिंदू समाज संगठित और अनुशासित हो जाए तो विदेशी शासन को चुनौती दी जा सकती है।

हेडगेवार ने शाखाओं की शुरुआत की जहाँ युवाओं को सुबह-सुबह शारीरिक व्यायाम, खेलकूद और राष्ट्रीय गीतों के साथ जोड़ा जाता था। शाखाएँ केवल खेल का मैदान नहीं थीं, बल्कि वे एक ऐसी जगह थीं जहाँ अनुशासन, एकजुटता और हिंदू सांस्कृतिक गौरव का प्रशिक्षण दिया जाता था।


 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , RSS,

स्वतंत्रता संग्राम और संघ

संघ की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका हमेशा विवादों से घिरी रही है। हेडगेवार ने व्यक्तिगत रूप से नमक सत्याग्रह और पूर्ण स्वराज आंदोलन में भाग लिया, लेकिन संगठनात्मक रूप से आरएसएस ने खुद को बड़े राजनीतिक आंदोलनों से अलग रखा। आलोचक इसे ब्रिटिश सरकार के साथ मौन सहयोग मानते हैं, जबकि समर्थकों का तर्क है कि संघ अपनी ऊर्जा “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” और संगठन निर्माण में लगा रहा।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कांग्रेस के हजारों नेता और कार्यकर्ता जेल गए। इस समय संघ ने संगठन के स्तर पर कोई बड़ा आंदोलन नहीं किया। यही कारण है कि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में आरएसएस की छवि स्पष्ट नहीं है और इस पर लगातार बहस होती रही है।


गोलवलकर का नेतृत्व और विचारधारा का मोड़

1940 में हेडगेवार के निधन के बाद माधव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरुजी) संगठन के दूसरे सरसंघचालक बने। उनके कार्यकाल में संघ का सबसे बड़ा विस्तार हुआ। उन्होंने संघ को केवल शाखाओं तक सीमित न रखकर शिक्षा, समाजसेवा और धार्मिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में फैलाया।

गोलवलकर की पुस्तक We, or Our Nationhood Defined और Bunch of Thoughts संघ की विचारधारा का आधार बनी। इसमें उन्होंने भारत को “हिंदू राष्ट्र” बताया और मुसलमानों तथा ईसाइयों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखा। आलोचक कहते हैं कि गोलवलकर के विचारों ने संघ को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की दिशा में धकेला, जबकि समर्थक उन्हें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रवक्ता मानते हैं।


गांधी हत्या और संघ पर संकट

30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या ने पूरे देश को हिला दिया। हत्यारे नाथूराम गोडसे का पुराना रिश्ता आरएसएस और हिंदू महासभा दोनों से रहा। इस कारण संघ पर संदेह की गहरी छाया पड़ी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार पटेल ने संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया।

इस दौरान हजारों संघ कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। लगभग डेढ़ साल तक चले इस प्रतिबंध ने संगठन को गहरी चोट पहुंचाई। अंततः 1949 में संघ ने संविधान और तिरंगे के प्रति निष्ठा की शपथ दी और उस पर से प्रतिबंध हटा। यह घटना संघ के इतिहास का निर्णायक मोड़ साबित हुई।


समाज में भूमिका और आलोचना

स्वतंत्रता के बाद आरएसएस ने खुद को केवल सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत किया। उसने शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास में कई पहल कीं। “विद्या भारती”, “वनवासी कल्याण आश्रम” और “सेवा भारती” जैसे संगठन इसी दिशा में बने। समर्थकों का कहना है कि यह संगठन सेवा और राष्ट्रनिर्माण में योगदान देता है।

लेकिन आलोचक तर्क देते हैं कि संघ की सेवाएँ अक्सर उसकी विचारधारा को बढ़ावा देने का साधन होती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उसकी पाठ्यपुस्तकों और प्रशिक्षण पद्धतियों पर आरोप लगते हैं कि वे इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या करती हैं।


हिन्दुत्व और राजनीति

संघ की विचारधारा हिन्दुत्व पर आधारित है। विनायक दामोदर सावरकर ने “हिन्दुत्व” शब्द को परिभाषित करते हुए भारत को हिंदुओं की पवित्र भूमि और पितृभूमि बताया था। आरएसएस इसी विचार को आधार मानकर आगे बढ़ा।

1970 और 1980 के दशक में संघ परिवार ने राजनीतिक मोर्चे पर कदम बढ़ाए। भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) संघ की राजनीतिक शाखा के रूप में सामने आई। अयोध्या आंदोलन और बाबरी मस्जिद विध्वंस ने संघ परिवार को भारतीय राजनीति के केंद्र में ला दिया।

आज भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है और उसके कई शीर्ष नेता संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघधीरेंद्र झा का विश्लेषण: फ्रिंज संगठन और नेटवर्क

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार और शोधकर्ता धीरेंद्र झा ने आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों पर गहन अध्ययन किया है। उनकी चर्चित पुस्तक Shadow Armies: Fringe Organisations and Foot Soldiers of Hindutva इस विषय पर सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में गिनी जाती है।

झा का विश्लेषण इस बात पर केंद्रित है कि आरएसएस केवल एक संगठन नहीं बल्कि एक “पारिवारिक नेटवर्क” है जिसमें सैकड़ों छोटे-बड़े संगठन शामिल हैं। ये संगठन अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय रहते हैं — शिक्षा, धर्मांतरण विरोध, गौ रक्षा, सांस्कृतिक गतिविधियाँ, धार्मिक जुलूस और राजनीतिक दबाव समूह।

धीरेंद्र झा लिखते हैं कि जब भी समाज में ध्रुवीकरण बढ़ाने वाले कदम उठाने होते हैं, तब इन्हीं फ्रिंज संगठनों को आगे किया जाता है। जैसे किसी राज्य में सांप्रदायिक दंगे हों या किसी विश्वविद्यालय में वामपंथी आवाज़ को दबाना हो, तो ये संगठन सक्रिय हो जाते हैं। आरएसएस और भाजपा इनसे दूरी बनाकर यह संदेश देते हैं कि वे “मुख्यधारा” की राजनीति कर रहे हैं। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इन संगठनों के नेता और स्वयंसेवक आरएसएस से निकले हुए होते हैं और संघ की शाखाओं से ही प्रशिक्षित रहते हैं।

झा ने अपनी पुस्तक में आठ प्रमुख संगठनों का विस्तृत विवरण दिया है — सनातन संस्था, बजरंग दल, हिंदू युवा वाहिनी, अभिनव भारत, श्री राम सेना, हिंदू ऐक्य वेदी, राष्ट्रीय सिख संगत और भोंसला मिलिट्री स्कूल। ये सभी संगठन किसी न किसी स्तर पर कट्टर हिंदुत्व राजनीति को बढ़ावा देते रहे हैं।

धीरेंद्र झा का तर्क है कि इन फ्रिंज संगठनों का अस्तित्व राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। वे कहते हैं:

“जब समाज में ध्रुवीकरण पैदा करने की ज़रूरत होती है, तब ये संगठन आगे आते हैं। जब आलोचना होती है, तो मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियाँ उन्हें ‘फ्रिंज’ बताकर किनारा कर लेती हैं। लेकिन वस्तुतः ये संगठन संघ परिवार का ही हिस्सा हैं।”

उनके अनुसार, यह एक तरह का “सुरक्षा कवच” है। मुख्यधारा की राजनीति ध्रुवीकरण की गंदगी से बची रहती है, जबकि ये संगठन विवाद उठाकर एजेंडा आगे बढ़ाते हैं। यही कारण है कि ये समूह लोकतंत्र और सामाजिक सौहार्द के लिए चुनौती बन जाते हैं।

झा यह भी बताते हैं कि इन संगठनों की प्रेरणा सावरकर की “हिन्दुत्व” की अवधारणा और गोलवलकर की शिक्षाओं से मिलती है। उनके अनुसार, इन संगठनों की भाषा और गतिविधियाँ अल्पसंख्यकों — विशेषकर मुसलमानों और ईसाइयों — के खिलाफ नफरत फैलाने की ओर झुकाव रखती हैं।

धीरेंद्र झा का विश्लेषण हमें यह समझने में मदद करता है कि संघ परिवार का वास्तविक प्रभाव केवल भाजपा या आरएसएस की शाखाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बहुस्तरीय नेटवर्क है जो समाज और राजनीति के हर स्तर पर असर डालता है।


आधुनिक काल में विस्तार

21वीं सदी में आरएसएस का दावा है कि उसके 50,000 से अधिक दैनिक शाखाएँ और करोड़ों स्वयंसेवक हैं। यह शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, ग्राम विकास और सामाजिक सेवा में सक्रिय है। समर्थक इसे “विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन” मानते हैं।

वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने संगठन को अधिक लचीला रूप देने और आधुनिक समाज से जोड़ने की कोशिश की है। महिला सहभागिता, सामाजिक समरसता और तकनीकी उपयोग पर भी हाल के वर्षों में ध्यान दिया गया है।


शताब्दी समारोह और विवाद

1 अक्टूबर 2025 को आरएसएस की शताब्दी के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागपुर में विशेष समारोह में हिस्सा लिया। इस दौरान स्मारक डाक टिकट और 100 रुपये का सिक्का जारी किया गया। सिक्के पर भारत माता की छवि ने विपक्षी दलों को आपत्ति का मौका दिया और उन्होंने इसे “हिंदू राष्ट्र की सांप्रदायिक परिकल्पना” बताया।

शताब्दी समारोह ने यह साबित किया कि सौ साल बाद भी संघ भारतीय राजनीति और समाज का केंद्रीय मुद्दा बना हुआ है। समर्थक इसे राष्ट्र गौरव मानते हैं, जबकि विरोधी इसे संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध कदम बताते हैं।


निष्कर्ष

आरएसएस के 100 सालों की यात्रा एक गहरी बहस का विषय है। यह संगठन एक ओर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक सेवा का प्रतिनिधि माना जाता है, तो दूसरी ओर इसे सांप्रदायिकता और अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति का आधार भी कहा जाता है।

धीरेंद्र झा का शोध यह स्पष्ट करता है कि संघ परिवार का नेटवर्क केवल शाखाओं और मुख्यधारा की राजनीति तक सीमित नहीं है। बल्कि इसके इर्द-गिर्द फैले अनेक संगठन रणनीतिक ढंग से काम करते हैं और समाज में ध्रुवीकरण की भूमिका निभाते हैं। यही संघ परिवार की वास्तविक ताकत और वास्तविक विवाद दोनों का मूल है।

भविष्य में यह बहस और तेज होगी कि आरएसएस का वास्तविक योगदान भारतीय समाज और लोकतंत्र को मजबूत करने में है या विभाजन की खाई को और गहरा करने में।


News Source

📚 स्रोत (References / Sources)

  1. Testbook – In which year the Rashtriya Swayamsewak Sangh was founded
  2. Wikipedia – Rashtriya Swayamsevak Sangh
  3. Wikipedia – K. B. Hedgewar
  4. Caravan Magazine – How MS Golwalkar’s ideology underpins Modi’s India
  5. Wikipedia – M. S. Golwalkar
  6. Indian Express – RSS helped British: Congress rubbishes PM Modi’s claim
  7. Times of India – Congress attacks RSS; claims Sangh sided with British
  8. The Wire – The RSS and Hindu Mahasabha Played No Role in Freedom Struggle
  9. The Print – How RSS was impacted by the ban after Gandhi’s assassination
  10. The Wire – When Sardar Patel Took on RSS (1948 ban)
  11. Hindutva Harassment Field Manual – What is Hindutva?
  12. Wikipedia – Hindutva
  13. NPR – India’s RSS and rise of Hindu nationalism
  14. Newslaundry – Interview: Dhirendra K. Jha on his book Shadow Armies
  15. HarperCollins – Author details: Dhirendra K. Jha

TAGGED: Century of rss, RSS, आरएसएस, आरएसएस का 1 दशक, आरएसएस के 100 साल
Leave a comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts

  • पेट के लिए फायदेमंद 4 फल: पाचन और इम्युनिटी को मजबूत करने वाले प्राकृतिक साथी
  • काली कॉफी से लिवर की सेहत में सुधार: फैटी लिवर से बचाव का प्राकृतिक उपाय
  • खाने के बाद पेट मे गैस या पेट फूलना और ब्लोटिंग जैसी समस्याओं का परमानेंट इलाज़
  • मूली: पाचन की संजीवनी, लेकिन इन 5 चीजों के साथ खाने से हो सकता है नुकसान
  • 🌾 मधुमेह रोगी चावल इस तरह खा सकते हैं — बिना किसी हानि के, स्वाद और स्वास्थ्य दोनों सुरक्षित

You Might Also Like

Politics

उत्तराखंड सरकार का प्रचार खर्च: पांच साल में एक हज़ार करोड़ का आंकड़ा पार

October 5, 2025
BusinessPolitics

अडानी मामले में यूट्यूब व इंस्टाग्राम सामग्री हटाने की घटना: पूरी कहानी

September 19, 2025
Politics

नेपाल की नई प्रधानमंत्री: साहसी नेतृत्व और ईमानदारी की मिसाल

September 16, 2025
BusinessPolitics

अडानी पावर को 1020 एकड़ ज़मीन सिर्फ 1 रुपये में! पिर्पैंती थर्मल प्लांट (भीगलपुर, बिहार) विवाद की पूरी कहानी

September 15, 2025

Search Box

Pages

  • About Us
  • Contact Us – संपर्क करे
  • Disclaimer
  • Privacy Policy
  • Terms of Service – Newswaqt.in
News waqtNews waqt
Follow US
  • Home
  • Health
  • Entertainment
  • Sports
  • Politics
  • Tech
  • Science
  • Education
  • Local News
  • Business
  • Global
adbanner
AdBlock Detected
Our site is an advertising supported site. Please whitelist to support our site.
Okay, I'll Whitelist
Welcome Back!

Sign in to your account

Lost your password?