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News waqt > Business > अडानी मामले में यूट्यूब व इंस्टाग्राम सामग्री हटाने की घटना: पूरी कहानी
BusinessPolitics

अडानी मामले में यूट्यूब व इंस्टाग्राम सामग्री हटाने की घटना: पूरी कहानी

Amit gupta
Last updated: 2025/09/19 at 3:01 PM
Amit gupta
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7 Min Read
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लोकतंत्र पर खतरा हाल ही में भारत में एक ऐसा मुद्दा उठा है जिसने अभिव्यक्ति की आज़ादी, मीडिया की भूमिका और न्यायपालिका की शक्तियों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अडानी समूहअडानी समूह से जुड़े 138 यूट्यूब वीडियो और 83 इंस्टाग्राम पोस्ट को निचली अदालत के आदेश पर हटा दिया गया है। इस घटना ने न केवल मीडिया समुदाय में हलचल मचा दी है बल्कि आम नागरिकों के बीच भी यह प्रश्न उठाया है कि क्या किसी व्यक्ति या समूह का नाम लेना अब “मानहानि” की स्थिति बन गयी है—और यदि हाँ, तो सीमाएँ क्या हों?

Contents
लोकतंत्र पर खतरा अडानी मामले में अदालत का आदेशकौन-कौन शामिल हैं, किस तरह की सामग्री हटापत्रकारों व सोशल मीडिया का रुखकानूनी एवं सामाजिक पहलूमानहानि कानून का दायराअभिव्यक्ति की आज़ादी (Freedom of Expression)सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और जिम्मेदारीबहस: लोकतंत्र, न्याय और मीडिया की भूमिका“अगर नाम लेना अपराध” बन जाएन्यायालय का तर्क और प्रक्रियामीडिया और उपयोगकर्ताओं की चुनौतियाँसंभावित प्रभावनिष्कर्ष

लोकतंत्र पर खतरा अडानी मामले में अदालत का आदेश

  • अदालत का आदेश: दिल्ली की एक निचली अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि अडानी से जुड़े सभी ऐसे वीडियोज और पोस्ट हटाये जाएँ जहाँ अडानी का नाम आता हो।
  • कितनी सामग्री हटायी गयी: इस आदेश के बाद कुल 138 वीडियो यूट्यूब से और 83 पोस्ट इंस्टाग्राम से हटा दिए गए।
  • कहां से आई कार्रवाई: यह कदम उठाया गया था मानहानि के आरोपों के मद्देनज़र, लेकिन अदालत ने स्पष्ट नहीं किया कि इन वीडियोज या पोस्ट्स में किस में किस तरह की मानहानि हुई है।

कौन-कौन शामिल हैं, किस तरह की सामग्री हटा

  • हटाये गए वीडियो और पोस्ट्स में शामिल हैं: पत्रकारों और विश्लेषकों के इंटरव्यू जैसे प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा, सुचेता दलाल, सुब्रमण्यम स्वामी आदि के। इसके अलावा, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी के भाषणों के अंश, सुप्रिया श्रीनेत की प्रेस कॉन्फ्रेंस, और समाचार रिपोर्टों पर आधारित क्लिप्स भी शामिल हैं।
  • मीडिया संस्थाएँ और यूट्यूबर्स जिन्हें नोटिस भेजा गया: जिन नामों का उल्लेख हुआ है उनमें रवीश कुमार, अभिसार शर्मा, ध्रुव राठी, अजीत अंजुम, आकाश बनर्जी, “द वायर” और “न्यूजलॉन्ड्री” शामिल हैं।

लोकतंत्र पर खतरापत्रकारों व सोशल मीडिया का रुख

  • पत्रकारों ने आरोप लगाया है कि उन्हें उस अदालत में सुनवाई का अवसर नहीं मिला जिसमें यह तय हो कि क्या वे मनहानि का दोषी हैं या नहीं। आदेश बहुत व्यापक था—जहाँ भी अडानी का नाम होगा, सामग्री हटा दो।
  • कई लोग इस कार्रवाई को लोकतंत्र व अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला मान रहे हैं। कुछ ने व्यंग्य में कहा है कि इस तरह के आदेशों से ऐसा प्रतीत होता है जैसे भारत में नाम लेने पर ही कार्रवाई हो जायेगी, आलोचना करने की गुंजाइश कम होगी।

कानूनी एवं सामाजिक पहलू

मानहानि कानून का दायरा

भारत में मानहानि (defamation) की धाराएँ मौजूदा कानूनों में मौजूद हैं। व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसकी प्रतिष्ठा को झूठे या अपमानजनक बातों से बचाया जाए। लेकिन ये कानून और उनके उपयोग बहुत संतुलन की मांग करते हैं:

  • सचाई या सार्वजनिक हित: यदि किसी कथन में सार्वजनिक हित हो और वह सच हो, तो वह मानहानि नहीं मानी जाती।
  • न्यायालय की प्रक्रिया: किसी को दोषी ठहराने से पहले सुनवाई होनी चाहिए; उसकी ओर से बचाव की स्थिति होनी चाहिए।

लोकतंत्र पर खतरा

अभिव्यक्ति की आज़ादी (Freedom of Expression)

भारतीय संविधान की धारा 19(1)(a) अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है, लेकिन इसके साथ 19(2) के तहत कुछ सीमाएँ भी हैं, जैसे कि मानहानि, सार्वजनिक शांति, देश की सुरक्षा आदि। इस घटना में ये सीमाएँ विशेष रूप से आँखों के सामने आ रही हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और जिम्मेदारी

यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्मों को अक्सर उपयोगकर्ताओं की सामग्री की वजह से कानूनी दायित्वों का सामना करना पड़ता है। जब कोई अदालत आदेश देती है, तो इन प्लेटफॉर्मों को नियमों के मुताबिक कार्रवाई करना होता है। लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि:

  • प्लेटफॉर्म को कितनी तेजी से प्रतिक्रिया देनी चाहिए?
  • क्या “ऑटोमैटिक ब्लॉक” या बड़े पैमाने पर सामग्री हटाने का आदेश न्यायसंगत है?
  • उपयोगकर्ता या कंटेंट क्रिएटर को नोटिस दिए बिना सामग्री हटाना कितनी हद तक कानूनी या नैतिक है?

बहस: लोकतंत्र, न्याय और मीडिया की भूमिका

“अगर नाम लेना अपराध” बन जाए

इस मामले ने इस प्रश्न को हवा दी है कि क्या सार्वजनिक हस्तियों या शक्तिशाली समूहों का नाम लेना बतौर आलोचना अगर मुश्किल हो गया तो सार्वजनिक संवाद कैसे चलेगा। आलोचनाएँ मीडिया, पत्रकारों, नागरिकों द्वारा होने चाहिए ताकि ज़िम्मेदार शासन और पारदर्शिता बनी रहे।

न्यायालय का तर्क और प्रक्रिया

  • ऐसे आदेश जो व्यापक हों—जैसे “जहाँ भी अडानी नाम आए, सामग्री हटाओ”—उनमें अदालत द्वारा स्पष्टता और सीमा निर्धारण बहुत ज़रूरी है।
  • कानूनी प्रक्रिया के मुताबिक, आरोपी के पक्ष को सुने बिना आदेश देना न्यायसंगत नहीं माना जाता।

मीडिया और उपयोगकर्ताओं की चुनौतियाँ

  • पत्रकारों को डर हो सकता है कि किसी विवादित विषय पर बोलने से उन्हें कानूनी कार्रवाई झेलनी पड़े।
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की स्वचालित तंत्र अक्सर “फेंक-ब्लॉक” कर देते हैं, जिससे सही-गलत की जाँच मुश्किल होती है।

संभावित प्रभाव

  • सूचना का संकुचन (information suppression): यदि मीडिया से डर लगे कि किसी कंपनी या ताकतवर व्यक्ति का नाम लेना है तो नुकसान हो सकता है, तो जानकारी सार्वजनिक नहीं पहुँच सकेगी।
  • स्व-सेन्सरशिप का खतरा: पत्रकार और क्रिएटर खुद ही सोचेंगे कि क्या बोलना है क्या नहीं, जिससे आलोचनात्मक आवाज़ कम हो जाएगी।
  • कानूनी मिसालें: यह घटना वाकई एक मिसाल बनेगी कि किस तरह अदालतें और सरकार शक्तिशाली हितों संबंधी मामलों में आदेश दे सकती हैं।

निष्कर्ष

यह घटना केवल एक विशिष्ट विवाद नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, मीडिया की भूमिका और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए एक बड़े चौराहे की तरह है। यह हम सभी के लिए ज़रूरी है कि हम इस तरह की कार्रवाईयों पर बारीकी से देखें:

  1. क्या न्यायालय ने पर्याप्त सुनवाई की है?
  2. क्या आदेश की सीमाएँ स्पष्ट थीं?
  3. क्या सार्वजनिक हित और अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा हुई है?

अगर लोकतंत्र है, तो आलोचना, चर्चा और विरोध को जगह मिलनी चाहिए। यदि ऐसा न हो, तो “नाम न लेना” ही सुरक्षित विकल्प बन जायेगा—and that’s not democracy, that’s censorship by stealth.


न्यूज़ सोर्स

The Indian Express

The Wire


TAGGED: मीडिया की आज़ादी पर हमला, लोकतंत्र और मीडिया, लोकतंत्र पर खतरा, लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्र संकट में
1 Comment
  • vicky says:
    September 19, 2025 at 4:56 pm

    Nice

    Reply

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