लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश से एक बड़ा भर्ती घोटाला सामने आया है जिसने प्रदेश की योगी सरकार को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। लखीमपुर सहकारी बैंक भर्ती घोटाला लखीमपुर अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में हुई 27 नियुक्तियों का मामला अब राज्यभर में चर्चा का विषय बन गया है। आरोप है कि इस भर्ती में सत्ताधारी दल के मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के रिश्तेदारों को प्राथमिकता दी गई और आरक्षण के नियमों की पूरी तरह अनदेखी की गई। यह मामला न केवल भाई-भतीजावाद का उदाहरण है बल्कि सामाजिक न्याय और पारदर्शिता के सिद्धांतों पर भी गहरी चोट है।
लखीमपुर सहकारी बैंक भर्ती घोटाला: कैसे हुई अनियमित भर्ती
लखीमपुर अर्बन कोऑपरेटिव बैंक ने 2019 में क्लर्क, कैशियर और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जैसे पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था। लेकिन विज्ञापन में पदों की कुल संख्या स्पष्ट नहीं बताई गई। 31 दिसंबर 2019 तक आवेदन स्वीकार किए गए, लेकिन इसके बाद न तो कोई लिखित परीक्षा आयोजित की गई और न ही इंटरव्यू की पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई। अचानक से 27 लोगों की नियुक्ति कर दी गई, जिससे आवेदकों और शेयरधारकों में गुस्सा फैल गया। बैंक की तत्कालीन चेयरमैन पुष्पा सिंह के कार्यकाल में की गई ये नियुक्तियां संदिग्ध मानी जा रही हैं।
जातीय आधार पर भेदभावपूर्ण नियुक्तियां
27 नियुक्तियों में से 15 यानी लगभग 55% पद ठाकुर समुदाय को दिए गए, जबकि बैंक के कुल 12,500 शेयरधारकों में ठाकुर समुदाय की हिस्सेदारी केवल 20-25% है। इससे साफ है कि जातीय पक्षपात हुआ। आरक्षण नियमों के अनुसार अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लिए 6 पद आरक्षित होने चाहिए थे, लेकिन केवल 2 नियुक्तियां हुईं। ओबीसी वर्ग को 7 पद मिलने चाहिए थे, जबकि केवल 6 को ही मौका मिला। ब्राह्मण समुदाय से 4 लोगों की नियुक्ति की गई। यह संविधान के अनुच्छेद 16(4) का उल्लंघन है, जो समान अवसर और सामाजिक न्याय की गारंटी देता है।
राजनीतिक रसूख और भाई-भतीजावाद
भर्ती प्रक्रिया में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि अधिकांश नियुक्तियां सत्ताधारी दल के बड़े नेताओं के रिश्तेदारों को मिलीं।
- पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और सांसद अजय मिश्र टेनी के रिश्तेदारों को दो पद मिले।
- पूर्व सहकारिता मंत्री मुकुट बिहारी वर्मा के भाई के बेटे को क्लर्क की नौकरी दी गई।
- स्थानीय भाजपा विधायक अंबिका हल्दार के चचेरे भाई को कैशियर बनाया गया।
- बैंक के तत्कालीन सचिव ने भी अपने रिश्तेदार को प्रमोशन दिलवाने में प्रभाव डाला।
इन नियुक्तियों से स्पष्ट है कि योग्यता और मेरिट के बजाय राजनीतिक रसूख और सिफारिश को प्राथमिकता दी गई।
जांच अधिकारी का हितों का टकराव
2023 में सहकारिता विभाग को भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलीं, जिसके बाद जांच के लिए एक वरिष्ठ अधिकारी को भेजा गया। लेकिन जांच में यह तथ्य सामने आया कि उस अधिकारी के भतीजे को 2022 में इसी बैंक में क्लर्क की नौकरी मिली थी। यह स्पष्ट रूप से हितों का टकराव था। यही कारण रहा कि अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में भर्ती को “सामान्य” बता दिया, जबकि हकीकत इसके उलट थी। इससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए।
बैंक की स्थिति और शेयरधारकों पर प्रभाव
लखीमपुर अर्बन कोऑपरेटिव बैंक की स्थापना 1960 में हुई थी और यह स्थानीय किसानों और व्यापारियों को ऋण उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाता है। बैंक का सालाना टर्नओवर 500 करोड़ रुपए से अधिक है। लेकिन इस भर्ती घोटाले से शेयरधारकों का बैंक से भरोसा उठ गया है। योग्य उम्मीदवारों की अनदेखी कर रिश्तेदारों और सिफारिशी उम्मीदवारों को नौकरी देने से बैंक की कार्यकुशलता पर असर पड़ा है। स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि बैंक में ही भ्रष्टाचार होगा तो जनता का विश्वास कैसे कायम रहेगा।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और विरोध
इस घोटाले पर विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। भीम आर्मी प्रमुख और सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने इस मामले को जातिवाद और भ्रष्टाचार का “जीता-जागता सबूत” बताया। उन्होंने मांग की कि:
- भर्ती प्रक्रिया को तत्काल निरस्त किया जाए।
- दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
- नई भर्ती प्रक्रिया पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ की जाए।
विपक्षी दलों ने भी योगी सरकार पर युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया है।
न्यायिक और प्रशासनिक कार्रवाई की मांग
शेयरधारकों ने सहकारिता रजिस्ट्रार और राज्य सरकार को सामूहिक शिकायत सौंपी है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पीड़ित उम्मीदवार आरटीआई और न्यायालय का सहारा लेकर न्याय पा सकते हैं। कई लोगों ने सीबीआई जांच की मांग की है ताकि पूरे घोटाले की गहराई से पड़ताल हो सके। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के भ्रष्टाचार के लिए कठोर दंड का प्रावधान होना चाहिए ताकि भविष्य में कोई ऐसा करने की हिम्मत न करे।
युवाओं पर प्रभाव और भविष्य की चुनौतियां
उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी पहले से ही एक बड़ी समस्या है। इस घोटाले ने युवाओं का सिस्टम पर भरोसा तोड़ दिया है। जब नौकरी जातिवाद और राजनीतिक रसूख के आधार पर बंटी जाती है तो मेहनत और योग्यता बेकार हो जाती है। सहकारी बैंकों की भूमिका ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है और अगर इन संस्थानों में ही भ्रष्टाचार होगा तो किसानों और व्यापारियों का नुकसान होगा। इससे सरकार की “भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस” की नीति पर भी सवाल उठते हैं।
निष्कर्ष
लखीमपुर सहकारी बैंक भर्ती घोटाला उत्तर प्रदेश की व्यवस्था में गहरे जमे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का ताजा उदाहरण है। इस घटना ने दिखा दिया है कि राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग किस तरह से योग्यता पर भारी पड़ता है। यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ है तो उसे तत्काल इस भर्ती को निरस्त कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही भविष्य में पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए सख्त नियम लागू करने चाहिए। तभी युवाओं का सिस्टम पर भरोसा बहाल हो सकेगा और सामाजिक न्याय का सिद्धांत सार्थक होगा।
न्यूज़ सोर्स और संदर्भ:
यह आर्टिकल निम्नलिखित विश्वसनीय न्यूज़ सोर्स की रिपोर्टिंग पर आधारित है: दैनिक भास्कर, लाइव हिंदुस्तान, अमर उजाला, जागरण, द मूकनायक, टाइम्स ऑफ इंडिया, वार्ता डॉट कॉम और 4PM न्यूज़ नेटवर्क।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
यह घोटाला लखीमपुर खीरी के अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक में हुई 27 नियुक्तियों से जुड़ा है, जिसमें मंत्रियों और नेताओं के रिश्तेदारों को नौकरी दी गई और आरक्षण नियमों की अनदेखी हुई।
विज्ञापन में पदों की संख्या स्पष्ट नहीं बताई गई, न कोई लिखित परीक्षा हुई और न ही पारदर्शी साक्षात्कार। इसके बावजूद सीधे 27 लोगों की नियुक्ति कर दी गई।
आरोप है कि भाजपा नेताओं, मंत्रियों और बैंक अधिकारियों ने अपने रिश्तेदारों व नजदीकी लोगों को नौकरी दिलाई, जिससे पारदर्शिता और मेरिट प्रभावित हुई।
एससी/एसटी और ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित सीटें पूरी नहीं भरी गईं, जबकि एक ही जाति विशेष को असमान रूप से अधिक पद दिए गए — जिससे आरक्षण नीति का उल्लंघन हुआ प्रतीत होता है।
सहकारिता विभाग ने जांच की, पर रिपोर्ट में हितों के टकराव से जुड़ी शंकाएं आईं। शेयरधारक और विपक्ष अब सीबीआई जांच व भर्ती निरस्त करने की मांग कर रहे हैं।


