ग़ाज़ीपुर (उत्तर प्रदेश) — ग़ाज़ीपुर पुलिस लाठीचार्ज (Ghazipur Police Lathicharge) में घायल हुए भाजपा कार्यकर्ता सियाराम उपाध्याय (Siyaram Upadhyay) की मौत ने पूरे जिले में तनाव और सवाल दोनों खड़े कर दिए हैं। दिव्यांग होने के बावजूद सियाराम को कथित रूप से पुलिस की बर्बरतापूर्ण पिटाई का शिकार होना पड़ा, जिसके बाद 11 सितंबर 2025 को उनकी मृत्यु हो गई।
ग़ाज़ीपुर पुलिस लाठीचार्ज का घटनाक्रम
नोनहरा थाना क्षेत्र में हुए पुलिस लाठीचार्ज (Police Lathicharge in Ghazipur) के दौरान सियाराम उपाध्याय गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चार जगह गंभीर चोटें दर्ज की गईं।
- जबकि प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया।
यह विरोधाभास परिवार और ग्रामीणों की नाराज़गी का बड़ा कारण बना हुआ है।
भाजपा कार्यकर्ता की मौत से परिवार का गुस्सा
सियाराम उपाध्याय भाजपा के सक्रिय समर्थक थे। उनकी मौत के बाद परिवार ने कहा कि वे सरकार की ओर से दी गई सहायता राशि स्वीकार नहीं करेंगे। उनका आरोप है कि ग़ाज़ीपुर पुलिस (Ghazipur Police) मामले को दबाने की कोशिश कर रही है।
ग्रामीणों ने भी पुलिस पर अत्याचार का आरोप लगाया और कहा कि दिव्यांग होने के बावजूद सियाराम को बुरी तरह पीटा गया।
प्रशासन की कार्रवाई और जांच
भाजपा कार्यकर्ता की मौत (BJP Karyakarta Death in Ghazipur) के बाद पुलिस प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई की:
- 6 पुलिसकर्मी निलंबित
- 5 पुलिसकर्मी लाइन हाज़िर
- मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश
लेकिन परिवार का आरोप है कि उन्हें अब तक FIR की कॉपी तक नहीं दी गई, जिससे जांच की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
राजनीतिक बवाल
भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपने ही समर्थक की मौत पर कड़ा विरोध जताया और निष्पक्ष जांच की मांग की। विपक्षी दलों ने इसे पुलिस की मनमानी और क्रूरता का उदाहरण बताते हुए सरकार पर निशाना साधा।
सोशल मीडिया पर भी “सियाराम उपाध्याय”, “भाजपा कार्यकर्ता की मौत”, और “ग़ाज़ीपुर पुलिस लाठीचार्ज” जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।
सवाल और निष्कर्ष
- क्या सियाराम की मौत सिर्फ़ हार्ट अटैक से हुई या पुलिस पिटाई इसका असली कारण है?
- जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चोटें दर्ज हैं तो जिम्मेदारी क्यों तय नहीं हो रही?
- क्या निलंबन और जांच ही अंतिम कदम होगा या दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई भी होगी?
यह मामला केवल एक भाजपा समर्थक की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि पुलिस जवाबदेही (Police Accountability) और न्याय की पारदर्शिता का बड़ा सवाल है।

ग़ाज़ीपुर घटना का सामाजिक और राजनीतिक असर
ग़ाज़ीपुर पुलिस लाठीचार्ज में भाजपा कार्यकर्ता सियाराम उपाध्याय की मौत सिर्फ़ एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह समाज में पुलिस और जनता के रिश्तों की गंभीर तस्वीर भी दिखाती है। उत्तर प्रदेश में पहले भी कई बार पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इस मामले की संवेदनशीलता इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि मृतक भाजपा का सक्रिय समर्थक और दिव्यांग था।
परिजनों ने जिस तरह से सहायता राशि ठुकरा दी, वह यह दर्शाता है कि जनता अब केवल मुआवज़े से संतुष्ट नहीं होती, बल्कि पारदर्शी न्याय चाहती है। यह घटना प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही की कमी और जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गहरे सवाल उठाती है।
राजनीतिक स्तर पर भी यह मामला भाजपा कार्यकर्ताओं में असंतोष का कारण बन रहा है। जब सत्ताधारी दल के समर्थकों के साथ ऐसी घटनाएँ होती हैं, तो विपक्ष को हमला करने का सीधा मौका मिलता है। यही वजह है कि यह मामला सिर्फ़ ग़ाज़ीपुर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्य की राजनीति में भी लंबे समय तक चर्चा का विषय रहेगा।
सार यह है कि सियाराम उपाध्याय की मौत प्रशासन, राजनीति और समाज तीनों के लिए चेतावनी है कि कानून व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना जनता का भरोसा हासिल करना मुश्किल होगा।
निष्कर्ष
ग़ाज़ीपुर पुलिस लाठीचार्ज में भाजपा कार्यकर्ता सियाराम उपाध्याय की मौत ने प्रशासन और राजनीति दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब पूरा जिला और मृतक परिवार यही इंतज़ार कर रहा है कि क्या सरकार और पुलिस वाकई दोषियों को सज़ा दिला पाएंगे या यह मामला भी सिर्फ़ जांच और निलंबन तक ही सीमित रह जाएगा।