भीगलपुर के पिर्पैंती में बनाए जाने जा रहे थर्मल पावर प्लांट को लेकर हालिया खबरों ने राज्य स्तर पर हलचल पैदा कर दी है। रिपोर्टों के मुताबिक़ अडानी पावर को 1020 एकड़ ज़मीन परियोजना के लिए आवंटित की गई है और कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा जा रहा है कि उस ज़मीन के लिए प्रतीकात्मक राशि — मात्र ₹1 प्रतिवर्ष — जैसी शर्तें लागू की गई हैं। इस घटना ने राजनीतिक आलोचना, स्थानीय लोगों की चिंता और पर्यावरणीय सवालों को एक साथ सक्रिय कर दिया है।
अडानी पावर को 1020 एकड़ ज़मीन प्रोजेक्ट का स्कोप और आर्थिक पहलू
अडानी पावर को पिर्पैंती में 2,400 मेगावाट (तीन × 800 मेगावाट) क्षमता वाला अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट विकसित करने के लिए LoI/LoA और पावर सप्लाई एग्रीमेंट मिले हैं। कंपनी और राज्य की औपचारिक घोषणाओं के अनुसार यह परियोजना अरबों डॉलर का निवेश मांगती है — रिपोर्ट्स में लगभग ₹28,000–29,000 करोड़ (लगभग $3 बिलियन) का अनुमान दिया गया है — और इसका उद्देश्य बिहार को बड़ी मात्रा में स्थिर बिजली उपलब्ध कराना है।
ज़मीन, लीज़ की शर्तें और किसानों का मसला
अलग-स्रोत रिपोर्टों में कहा गया है कि कुल मिलाकर ~1,020 (कुछ रिपोर्टों में 1,020.60) एकड़ ज़मीन प्रोजेक्ट के लिए चिन्हित/लीज़ की गई है और लीज़ की अवधि 30–33 साल के आसपास बताई जा रही है; विवाद का केंद्र यह है कि कुछ हिस्सों में ज़मीन स्थानीय किसानों से ली गई और वहीं अभी भी कुछ किसानों को मुआवज़ा भुगतान का प्रश्न बना हुआ है। स्थानीय स्तर पर यह चिंता जताई जा रही है कि ज़मीन अधिग्रहण प्रक्रिया पारदर्शी रही या नहीं — और क्या किसानों को उचित मुआवज़ा एवं विकल्प दिए गए।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ
इस सौदे को लेकर विपक्ष और कुछ नागरिक-समूहों ने तीखी आलोचना की है — आरोपों में कहा गया है कि बड़े कॉरपोरेट समूहों को अनावश्यक रियायतें दी जा रही हैं, जिससे स्थानीय लोगों के हित प्रभावित हो सकते हैं। कुछ राजनीतिक दलों ने इसे चुनावी और नीतिगत सवाल के रूप में उठाया है। दूसरी ओर राज्य सरकार और प्रोजेक्ट के पक्ष में खड़े सूत्र कह रहे हैं कि यह परियोजना बिहार की ऊर्जा जरूरतें पूरी करने और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने में मददगार होगी, साथ ही नौकरी और बुनियादी ढाँचे के निवेश के वादे भी किए जा रहे हैं।
पर्यावरणीय चिंताएँ और क्लीयरेंस की स्थिति
कोयला-आधारित बड़े पावर प्रोजेक्टों के मामले में पर्यावरणीय प्रभाव, वृक्षों की कटाई, जल उपयोग और प्रदूषण नियंत्रक उपायों की गंभीरता से जाँच की जाती है। कुछ विश्लेषकों और पर्यावरण समूहों ने इस प्रोजेक्ट के संभावित प्रभावों पर सवाल उठाये हैं और पर्यावरणीय मंज़ूरी (Environmental Clearance) से जुड़े प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर भी ध्यान देने का अनुरोध किया है। उपलब्ध जनरल रिपोर्टों के अनुसार (अभी तक सार्वजनिक दस्तावेजों में कुछ औपचारिक क्लीयरेंस/ToR की स्थिति प्रोजेक्ट-वार भिन्न है), पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव का पूर्ण आकलन आवश्यक माना जा रहा है।
फायदे — क्या मिलने की उम्मीद है?
प्रोजेक्ट समर्थक कहते हैं कि 2,400MW जैसा बड़ा पावर प्लांट राज्य की बिजली आपूर्ति को मजबूत करेगा, रैखिक आर्थिक गतिविधि (निर्माण, सप्लाई-चेन, स्थानीय रोजगार) बढ़ेगी और लंबे समय में ऊर्जा-सुरक्षा में सुधार होगा। हालांकि ये लाभ तभी टिकाऊ साबित होंगे जब पारदर्शी मुआवज़ा, पर्यावरणीय मानदंडों का कठोर पालन और स्थानीय लोगों के पुनर्वास के ठोस उपाय सुनिश्चित किये जाएँ।
निष्कर्ष — संतुलित दृष्टि की ज़रूरत
पिर्पैंती परियोजना आकार तथा निवेश के लिहाज़ से महत्व रखती है और यह बिहार के ऊर्जा नक्शे को बदल सकती है। परंतु ज़मीन का सौदा, मुआवज़ा की विथिका, सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभाव और लोकतांत्रिक पारदर्शिता जैसे मूल प्रश्नों का समाधान ही तय करेगा कि यह परियोजना दीर्घकालिक रूप से स्थानीय और राज्य-स्तरीय हित में बनी रहेगी या नहीं। सरकार, कंपनी और नागरिक समाज के बीच स्पष्ट संवाद और मिलकर समस्या-समाधान ही आगे का रास्ता होना चाहिए।
स्रोत / बैकलिंक (जैसा आप चाह रहे थे):
LiveHindustan रिपोर्ट: https://www.livehindustan.com/bihar/adani-group-will-get-1020-acre-land-in-only-one-rs-for-pirpainti-thermal-plant-in-bhagalpur-bihar-201754968748576.html
